ग़ालिब चचा के नाम एक ख़त

सलाम ग़ालिब चचा, 

बोहोत दिन हुए तुमसे मुख़ातिब हुए। आज शाम कई  दिनों  बाद जब मैंने 'ओल्ड टॉम' की बोतल खोली तो जाने क्यों यक़ायक़ तुम्हारी याद आ गयी? कई दिनों से न तो किसी हसीना ने दिल ही तोड़ा और न ही दोस्तों की महफ़िल जमी। फिर जाने क्यों तुम्हारा ख़याल मन में आ गया? ख़ैर, जब ख़याल आ ही गया तो सोचा तुम्हें ख़त लिख डालें। वैसे तुम्हें जान के कुछ ख़ास ख़ुशी न होगी कि मौजूदा दौर में दुनिया भर में ख़त लिखने का चलन काफ़ी हद तक कम हो चला है। तार तो हमारी सरकार ने कुछ साल पहले ही बंद कर दिया था। अब ऐसे में तुम्हारे शेर, 

“क़ासिद के आते आते ख़त इक और लिख रखूं

मैं जानता हूँ वो जो लिखेंगे जवाब में”

के क्या म'आनी हों? अब ना तो क़ासिद नज़र आता है और न ख़त। 

एक अरसा गुज़र गया तुम्हेँ ख़त लिखे। लिखते भी कैसे? तुम कौन सा अपना पता छोड़ के दुनिया से रुख़सत हुए थे? इसी सोच में थे कि इतने में हमारी अहलिया ने अपने शीरीं लबों से फूटती हुई शहद-ओ-शकर सी आवाज़ में एक 'गुज़ारिश' कर डाली। 'गुज़ारिश-ए-अहलिया' कुछ यूँ थी – हमें चांदनी चौक के किनारी बाज़ार से उनके दुपट्टे की किनारी के सैंकड़ों मोतियों में से टूटे हुए एक मोती का हम-शक्ल शाम तक उनके सुपुर्द करना था। चचा, तुम तो जानते ही हो कि हम न तो तुम्हारी तरह शायरी ही कर सकतें हैं और न बेगम की हुक़्म-उदूली।हम ठहरे एक नेक और फ़रमाँ-बर्दार शौहर। सो जून की भरी दुपहरी में, सर पे कफ़न बाँध, हम निकल पड़े बेगम साहिबा कि ख़्वाहिश पूरी करने। सच कहें तो मन में ये भी था कि तुम्हारे आस-पड़ोस से शायद तुम्हरा मौजूदा रिहायशी पता भी मिल जाए।

चचा, यक़ीन मानो अगर तुम्हें शाजहानाबाद आने का इत्तेफ़ाक़ हो तो तुम इसे पहचान ना पाओगे। बल्ली मारां तो छोड़ो तुम अपनी हवेली तक को न पहचान  पाओगे। बहरहाल, मैं जैसे ही तुम्हारी हवेली के सामने से गुज़रा, तो हवेली के अहाते में एक उम्र-दराज़ शक़्स बैठा अपने हुक़्क़े की जान ले रहा था। चूँकि उम्र में तुमसे दो-चार बरस ही कम मालूम पड़ता था, मैंने अंदाज़ा लगाया कि उसे तुम्हारा पता ज़रूर मालूम होगा। ज़रा क़रीब जा के मैंने जैसे ही पूछा, "मियां, गुज़रे वक़्त इस हवेली में असद-उल्लाह बेग ख़ां उर्फ “ग़ालिब” रहा करते थे। कुछ ख़बर है उनकी?" मेरे कहने की देर थी कि उस पीर-ओ-मुर्शिद से दिखने वाले उम्र रसीदा जाहिल ने अपनी सफ़ेद दाढ़ी के पीछे छुपे पोपले और पान से सने खून-फ़िशां मुंह से तुम्हारी ख़ातिरदारी में तूल-तवील जो क़सीदा पढ़ना शुरू किया उसे यहाँ दोहराना मुनासिब न होगा। बस इतना कहना काफ़ी होगा की उसने तुम्हारा ही एक शेर हमारे मुंह पे दे मारा: 

“मस्जिद के ज़ेर-ऐ-साया इक घर बना लिया है

ये बन्दा-ऐ-कमीना हम-साया-ए-ख़ुदा है।”

आगे तुम ख़ुद समझदार हो चचा। 

बहरहाल तुम्हारा पता तो नहीं मिला, अलबत्ता हम अपनी अहलिया के दुपट्टे की किनारी का मोती ले के जैस ही निकले तो एक आम वाला नज़र आ गया। दूर से लगा मानों तुम्हीं बैठे आम बेच रहे थे। वही डील-डॉल, वही कद-काठी, वही नैन- नक़्श। हमें काटो तो खून नहीं। फिर ज़रा पास गए और उसकी बेसुरी आवाज़ में जब ज़ौक़ का ये शेर, 

"बादाम दो जो भेजें हैं बटुए में डाल कर,

ईमान ये है कि भेज दें आँखें निकाल कर"

सुना तब जा के कहीं तसल्ली हुई के तुम न थे। अंदाज़ा लगाया कि वो ज़ौक़ भी न थे। ज़ौक़ का कोई मुरीद था। बुरा न मानियो चचा पर ज़ौक़ के चर्चे आज भी हैं हालाँकि मरने के बाद तुम ज़रा ज़्यादा मक़बूल हुए। खैर छोड़ो ज़ौक़ को, कम्बख़्त ने जीते जी तुम्हें 'पोइट-लॉरेट' न होने दिया और मरने के बाद भी तुम्हें चैन से जीना नहीं दे रहा। अच्छा चचा, तुम्हारी आम-नोशी बिहिश्त में भी जारी है? हालाँकि तुम्हारे जन्नत में होने का भरोसा हमें कम है पर तुम्हारे ही एक शेर से अंदाज़ा लगाया कि तुम्हें जन्नत नसीब हुई होगी:

“हम को मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन

दिल के ख़ुश रखने को ग़ालिब ये ख़याल अच्छा है।”  

तुम्हें  जान के मलाल  होगा की तुम्हारे जीते जी जितनी आम की नस्लें हिंदुतस्तान में थीं तुम्हारे जाने के बाद कई गुना बढ़ गयी हैँ। हर बरसकितनी ही नई नस्लें बाज़ार में आ जातीं  हैँ। काश तुम भी 'अलफोंसो', 'ज़ेवियर' और 'हैमलेट' का मज़ा चख़ पाते। इस से पहले तुम अपनासिर पकड़ लो चचा, तुम्हें बताना लाज़िमी है कि ये किसी अंग्रेजी ड्रामा-निगार के ड्रामें नहीं आम की नस्लें हैँ। गए साल तो आम की दुनिया में'योगी' ने भी ख़ूब धूम मचाई थी। तुम किसी मुग़ालते में न रहो इसलिए बता दूँ कि इस आम का नाम पड़ोसी सूबे के वज़ीर-ऐ-आला के नाम पर रखा गया है। जैसे तुम 'नज्म-उद-दौला', वैसे ये 'योगी'! ख़ैर, जैसे 'हैमलेट' खा के कोई शेक्सपियर नहीं हो जाता वैसे ही 'योगी' खा के कोई वज़ीर-ऐ-आला नहीं हो जाता। आम  के लिए तुम्हारी मोहब्बत को कौन नहीं जानता। कोई होगा जिसने तुम्हारा इज़हार-ऐ-मोहब्बत-ए-आम न सुना या पढ़ा हो: 

“मुझसे पूछो तुम्हें ख़बर क्या है,

आम के आगे नेशकर क्या है …

या ये होगा के फ़र्त-ए-राफ़त से

बाग़-बानों ने बाग़- ए-जन्नत से

अंगबीन के बा हुक़्म-ए रब्ब-इन-नास

भर के भेजें हैं सर-ब-मोहर गिलास।”

आम चाहने वाले तो लाखों मिलेंगे मगर मोहब्बत-ए-आम में गिरफ़्तार हो उस पे फ़ना हो जाना कोई तुम से आशिक़ से सीखे।              

तुम अपने दौर के नामी-गरामी शायर रहे ये कौन नहीं जानता। और जानते भी कैसे ना तुमने ख़ुद ही अपने नाम का इतना ढिंढोरा जो पीटा है: 

“हैं और भी दुनिया में सुख़नवर बोहोत अच्छे

कहतें हैं के ग़ालिब का है अंदाज़- ए-बयां और।”

 या फिर ये ही लो, 

"होगा कोई ऐसा भी कि ग़ालिब को न जाने,

शायर तो वो अच्छा है प बदनाम बोहोत है।” 

फिर भी तुम्हें जीते जी मिला ही क्या? बादशाह सलामत ने तुम्हें 'नज्म-उद-दौला' कह दिया और ज़रा सी पेंशन पा गये। शायद तुम सरीख़ों के लिए ही अकबर इलाहाबादी ने लिखा था,

“हम क्या कहें अहबाब क्या कार-ए-नुमायाँ कर गए

बी.ए. हुए नौकर हुए पेंशन मिली फिर मर गए।” 

मगर तुम तो बग़ैर बी.ए. ही पेंशन पा गए। वैसे देखा जाए तो पढ़ाई और लिखाई का आपस में कोई ख़ास रिश्ता है भी नही। शेक्सपियर भी तो पांचवी पास ही था मगर देखो दुनिया में धूम मचा गया। बहरहाल तुम्हारी शायरी को मद्दे-नज़र रखते हुए कम-अज़-कम तुम्हें 'भारत रत्न' से तो नवाज़ा ही जाना चहिये। कुछ बरस पहले जब मैंने यह मुद्दा उठाया था तो हमारी अदालत-ऐ-उज़्मा (सुप्रीम कोर्ट) के एक साबिक़ मुंसिफ - जनाब मार्कण्डेय काटजू ने बड़े ज़ोर-शोर से इसे सरकार के कानों तक पहुँचाने की कोशिश की थी। पर चूँकि सरकार ज़रा ऊँचा सुनती है, इसलिए उसके कान पे जून तक न रेंगी। दो-चार रोज़ तुम्हारा नाम इधर-उधर उछला और फिर ढाक के तीन पात। इसलिए अब मैंने अपनी सोच बदल ली है। मैं कहता हूँ कि सरकार ये तमग़े-इनाम छोड़, एक आम की नस्ल ही तुम्हारी नज़र कर दे तो भी कुछ बात बन जाए।  मैं पूछता हूँ कि  इतने आमों में एक ‘ग़ालिब’ नाम और जुड़ जायेगा तो क्या क़यामत आ जाएगी? ख़ैर, तुम्हारी क़िस्मत तुम्हारे जीते जी न बदली तो मरने के बाद क्या ख़ाक बदलेगी। और हम भी कहाँ के 'फैज़' ठहरे की "हमारे अश्क़ तेरी आक़िबत संवार चले।"

  चलो चचा, वक़्त ज़्यादा और ख़त लंबा  हो गया। तुम्हारा भी 'ओल्ड टॉम' का वक़्त हो रहा होगा। हमने तो अपनी अहलिया की 'गुज़ारिश' पे पीना छोड़ ही दिया है "पर अब भी कभी कभी, पीता हूँ रोज़-ए-अब्र ओ शब-ए-माहताब में।"  

बातें बोहोत हैं, सो फिर लिखूँगा। अगले ख़त का इंतज़ार करना।

तुम्हारा ख़ैर-ख़्वाह।

      

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